नाम और जन्म तिथि से कुंडली मिलान

विवाह गृहस्थाश्रम की आधारशिला है तथा उसी के माध्यम से मनुष्यदेवऋषि एवम पितृ आदि ऋणो से मुक्त होकर परम कल्याण को प्राप्त हो सकता है। इसी कारण शुभ लक्षणों से सुन्दर , सुशीला, मधुर भाषणी एवम पतिव्रता कन्या तथा कर्तव्यनिष्ठ, सुशिक्षित, सदाचारी एवं सुसंस्कृत लडके के साथ विवाह सम्बन्ध शुभ होता है। विवाह सम्बन्ध करने से पूर्व लडकेलड़की का कुलगौत्र, विद्या, धन, स्वास्थ् आयु इनगुणों की परीक्षा करने के बाद कुंडलियो में परस्पर मंगलिक आदि अरिष्ट योगों एवम वर्ण आदि अष्ट कूटो का विचार करना चाहिये। ज्योतिष में लग्न को शरीर तथा चन्द्रमा में मन् कहा गया हैइसीलिए हमारे आचार्यो ने, जन्मराशि एवम जन्म नक्षत्र से मिलान पद्धति का ज्ञान करना बताया है। सम्वतः इसी लिए जन्म राशि को सर्वाधिक प्रधानता दी गई है।

अष्टकूटों के अन्तर्गत निम्नलिखित तत्वों का विचार किया जाता है:-

  • 1  वर्ण         – 1 गुण 
  • 2  वश्य        – 2 गुण
  • 3 तारा         – 3 गुण
  • 4 योनि        – 4 गुण
  • 5 राशि मैत्री – 5 गुण
  • 6 गण मैत्री  – 6 गुण
  • 7 भकुट।     – 7 गुण
  • 8 नाड़ी।      – 8 गुण

इन तत्वों से कुल 36 गुण बनते हैइन तत्वो का वर्णन कर्मश इस प्रकार है :-

1 वर्णकूट विचार :-

सभी राशियो में ब्राह्मण, क्षत्रियों, वैश्य और शूद्र – ये चार वर्ण होते है।

कर्क वृश्चिक मीन राशियों का ब्राह्मण ।

सिंह, मेष स्वं धनु का क्षत्रिय।

वृष, कन्या , मकर का वैश्य ।

तथा मिथुन, तुला व कुंभ का शूद्र वर्ण होता  है।

वर का  वर्ण कन्या के वर्ण से श्रेष्ठ या एक समान होने पर एक गुण प्राप्त होता है, अन्यथा शून्य। 

विशेष 

यदि वर की राशि का वर्ण कन्या की राशी के वर्ण से  हीन भाव में होपरन्तु राशि पति उत्तम वर्ण होतो वर्ण मिलान शुभ  हो जाता है या वरकन्या राशि स्वामी परस्पर मित्र हो या वरकन्या का एक ही राशिस्वामी होतो इस दोष का निवारण हो जाता है।

2 वश्य विचार

चतुष्पद, मानव, जल्चर, वनचर  एवम कीट ये पांच वश्य पंचक है ।

– एक समान वश्य होने पर 2 गुण,

– एक वश्य व दूसरा शत्रु – एक गुण,

– एक वश्य एवम एक भक्ष्य होने पर आधा गुण होगा ।

– एक शत्रु तथा एक भक्षय होने पर शून्य गुण होगा ।

वरकन्या के राशि स्वामी परस्पर मित्र होतो दोष का परिहार माना जाता है। परस्पर योनि मैत्री होने पर भी इस दोष का निवारण हो जाता है ।

3 तारा विचार :-

इसका सम्बन्ध नक्षत्रों से हैजन्म नक्षत्र से गिनने पर तारा का ज्ञान होता हैजन्म, संपद, विपद, श्रेम, प्रत्यिर, साधक, वध, मैत्र, अतिमैत्र ये ताराएं है।

 कन्या के जन्म नक्षत्र से वर के जन्म नक्षत्र तक गिनकर दोनों तारा संख्याओं को अलगअलग 9 द्वारा भाग देने पर यदि शेष 3, 5 , 7 बचे तो अशुभ नहीं तो शुभ तारा होगी जिसके 3 गुण मिलेंगे ।

4 योनि विचार :-

अश्व, गज, मेष, सर्प, शवान, मार्जार, मूषक, गो, महिष, व्याघ्र, मृग, वानर, नकुल, तथा, सिंह आदि योनियों का ज्ञान जन्मनक्षत्र के अनुसार होता है । 

वर कन्या की एक योनि होना शुभ है। परस्पर अति मित्रता हो तो 4 गुणमित्र हो तो 3, उदासीनता, हो तो 2 , सामान्य वैर तो 1 गुण, महावैर हो तो शुन्य । 

5 ग्रह मैत्री विचार :-

अष्टकूटो में राशिस्वामी की मैत्री को  विशेष महत्व दिया गया है। मिलान में वर्ण, योनि, गण व षडाष्ट दोष होने पर भी यदि परस्पर राशि मैत्री हो तो सम्भवतः अन्य दोषों का निवारण हो जाता है ।

– वरकन्या की राशियो में परस्पर अतिमित्रता होने पर 5 गुण ।

– एक सम और दूसरा मित्र तो 4 गुण । 

– एक दूसरे में सम तो 3 गुण ।

एक मित्र दूसरा शत्रु तो एक गुण। 

– एक सम दूसरा शत्रु तो आधा गुण । 

– परस्पर शत्रु तो शुन्य ।

एक विचार यह भी है कि राशिपतियों में परस्पर वैर होने पर, राशि नवांशपति परस्पर मित्र हों तो विवाह शुभ माना जाता है।

6 गण विचार :-

जन्मकुन्डली में नक्षत्रों के अनुसार देवता गण, मनुष्य गण व  राक्षस गण का विचार होता है। 

– तीनों में वर कन्या का एक ही गण होतो 6 गुण ।

– वर का देव व कन्या का मनुष्य तो भी 6 गुण । 

–  कन्या का देव तथा वर का मनुष्य तो 5 गुण । 

– एक का देव या मनुष्य तथा दूसरे का राक्षस तो शून्य । 

परिहार या निवारण के रूप में राशि पतियों या राशि नवांशपति में, मित्रता एवम वरकन्या के नक्षत्रों की नाड़ियों में भिन्नता दोष का निवारण करती है।

7 भकूटविचार :-

भकूट का अभिप्राय वरकन्या की राशियों में परस्पर अन्तर से है।

– प्रथम – सप्तक – ये 6 प्रकार का होता है 1-7, 3-11, 2-12, 4-10, 5-9, 6- 8

– वरकन्या की जन्म राशि परस्पर 6वें एवम आठवें होतो षडाष्टक दोष,

– पांचवीं  नवमी ( नवपंचम), 

– दुसरीबाहरवी ( द्विद्वादशी दोष)  होता  है। 

– मेष वृश्चिक (1-8), 2-7,  3-10, 4-9, , 5- 12,  तथा 6-11  मित्र राशियों का षडाष्टक शुभ है

नवपंचम में-12-4, 8-4, 3-11, 6-10 ये नव पंचम अशुभ है

– द्विद्वादश दोष  में 1-2, 3-4, 7-8, 9-10 एवम 11-12 राशियों का द्विद्वादश होना अशुभ है ।

8 नाड़ी विचार :-

27 जन्म नक्षत्रों को 3 नाड़ीयों के रूप में बांटा गया है  आदि नाडी,  मध्य नाडी एवम अंत्य नाड़ी । इसके 8 गुण होते है एवम कुंडलीमिलान में इसका विशेष महत्व है।

वरकन्या का जन्म नक्षत्र एक ही नाड़ी में  पड़ना विवाह में अशुभ माना गया है । 

– दोनों की आदि नाड़ी होतो विवाह के बाद परस्पर वियोग ।

– मध्य नाड़ी हो तो दोनों की हानि । 

– अन्य हो तो वैधवय या विधवा योग की सम्भावना।

निवारण स्वरूप

– वर, कन्या की एक ही राशि , नक्षत्र अलग – 2 हो। 

– दोनों का जन्मनक्षत्र एक, राशिया भिन्न हो।

– दोनों का नक्षत्र एक परंतु चरण भिन्न हो। 

परिहार होने पर भी उपाय करवा लेना शुभता प्रदान करेगा।

निष्कर्ष

गुण मिलान 17 से 20 सामान्य, 21 से 29 तक उत्तम एवम 30 से 36  तक सरवोत्म । इसमें कोई सन्देह नहीं कि गुणों का मिलान वैवाहिकदृष्टि से शुभ है या फिर केवल नाम राशि के अनुसार गुण मिलान कर लेना ही पूर्ण पर्याप्त नहीं हैवर कन्या की जन्म कुंडली के ग्रहों को भी अच्छी तरह से परखना चाहिए।जैसे कुछ मुख्य बातों पर विचार कर लेना चाहििए :-

1 वर के सप्तम भाव का स्वामी जिस राशि में वही राशि कन्या की हो शुभ है।

2 वर का शुक्र जिस राशि में हो वही राशि कन्या की हो।

3 यदि कन्या की राशि वर् के सप्तमेश का उच्च स्थान हो तो भी दोनों के जीवन में प्रेम बढ़ता है।

4 इसके विपरीत सप्तमेश आठवी एवं अष्टमेश सातवे भाव में हो तथा सप्तम भाव पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो।

5 सप्तमेश क्रूर ग्रह से युक्त होकर बारहवें भाव में हो तो अशुभ।

6 इसके अतिरिक्त दोनों की कुंडली में त्रिबल शुद्धि ( चं, सू, गु) पर विचार करने के साथ साथ वर कन्या के जन्म लग्न एवं जन्म राशि के तत्वों ( पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु ) का भी विचार करना चाहिए। 

निष्कर्ष रूप में गुण ग्रहों के मिलान से ही संपूर्ण कुंडली मिलान होता है।

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